Wednesday, 4 January 2017

श्री शकरदानजी जेथलिया

                   श्री शकरदानजी महेडु जाड़ावत


*स्व: श्री शकरदानजी महेडु जाड़ावत

पिता  :-  श्री भेरूदानजी

जन्म :-  ग्राम- जैथलिया,

तहसील- तोडारायसिह, 

जिला- टोक, राजस्थान,

जन्म तिथि :- वि.स. 1986 भाद्रपद शुक्ला सप्तमी.

शिक्षा:- ग्रामीण चटसाल

व्यवसाय:- जनसेवा

स्वर्गवास:- वि. स. 2043 आषाढ सुदी बीज.

टोक जिले की टोडारायसिंह तहसील की पंचायत खरेडा के निरंतर 13 ( तेरह ) वर्ष तक सरपंच रहे। पंचायत के गावो में घर घर घूम कर जन सहयोग जुटाया जिससे खरेड़ा में सेकण्डरी स्कूल भवन तथा सेतीवास में ठाकुरजी के मंदिर का निर्माण सम्भव हो सका।

टोडारायसिंह तहसील मुख्यालय स्थित श्री करणी मंदिर को सद्रप्रयाश का ही सुखद परिणाम रहा है।
               
                      *"ओळू री ओळीया"*

श्री शकरदानजी सा महेडु जाड़ावत महेडु जैथलिया

इस्ट काव्य इतिहास विद, कुळ चाहू गुण कोस।
उण शकर ने देव अब, खलक हूत लिय खोस।।
जडावत जग मेह, पुरसारथ तिहु पाविया।
मुगती रे मग मेह, पग खाता दीधा परा।।
जडावत जोगोह, शकर निज पुरखा समो।
शिव-लोक गो सोह, वाल्हा ने विलखावतो।।
खरा गुणा री खाण, शकर तू शकर खरिस।   
सो गुण जग सरसाण, ऐकर सो वळ आवजे।।

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Monday, 2 January 2017

आई जेत बाई माँ

.               आई जेतबाई माँ

वाळोवड़ प्रगटी वेहद, वंश मेहड़ू वध जाण।
जैत बाई जगदम्ब रा, वेदों करे वखाण।।
कलयुग में परचा के तां, आप्या देवी अपार।
लाखा सदु शक्ति सबळ,इरण वर्ण आधार।।

  
                  छंद नाराच।          
                   
सर्व संताप कष्ट काप, सुख आपणी सदा।
अधिक माप, आई अमाप, सैन ताप ही कदा।
अरि उथाप जेही जाप, यो प्रताप ही अलं।
जरूर हाजरा हजुर, जगदम्बा जैतलँ,,1

महीप मान रो गुमान, हार सों उतारणि।
नशाय चारणाय वंश, दुःख को निवारिणी।
माहाय मोहमाय सेवगाय,एक तुं बळं
जरूर हाजरा,,,,,,           ,,,            2

सतं शातः ही विख्यात, रूप मात धारीयं।
अपार आपति विडार, ए समे ऊगारियं।
सदैव रूप ही अनूप, तुं पहिं पगे लळं।
                   जरूर हाजरा हजूर,,,,3

बणी कराळ नेत्र ज्वाळ, काळ रूप तुं बणी।
क्रोधाळ तुं दयाल तुं, विशाळ देवी धणी।
सम्भाळ भाळ पुत्र पाळ,रक्षती जळं थ ळं।
               जरूर हाजरा हजुर      4

महीय सागरं धरं,अधिक तेज मंदरं।
सूर नर असूर योंही, सेव कृत सुंदरं।
विडार दुःख वेदवा, पोकारता तेहि पळं।
                    जरूर हाजरा हजुर   5

लाखा सतन मेर मन, अन्न धन्न आपणी।
प्रसन्न वंश चारणा, विघन ही विडारणी।
कवि ही ठारणं ""दीयो, अधिक रीत उज्जवलं।
जरूर हाजरा हजुर जुगदम्ब जेतलं।।

                     छप्पय    
                       
जैतल तुं जगदम्ब, अम्ब जग थम्ब अळाको
जैतल तुं जगदम्ब, आध्य भेरु अपणा को
जैतल तुं जगदम्ब, वेदवां विघन विहंडन,
जैतल तुं जगदम्ब, खळा शात्रव नित खंडन,
वाळोवडेय देवी वेहद, अडरकव्या अवलंब है
कव्य हाथ जोड़,, ठारण कहे, जैतल तू जगदम्ब है।
               
                        *********      

रचियता कवि श्री ठारण भाई मधु दान जी मेहड़ू    पाटणा राज कवि
गुजराती में श्री महेश दान जी विजयकरण जी मेहड़ू   बोटाद
              हिंदी में संकलन एस डी सिंह मेहड़ू            
                           पूगल बीकानेर       
                     त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी।
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Monday, 19 December 2016

कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना


.         कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना
       
                              दोहा

सुरस्वती उजळ अती, वळि उजळी वाण।
करु प्रणाम जुगति कर, बाळाजती बखाण॥1॥
अंश रुद्र अगियारमो, समरथ पुत्र समीर।
नीर निधि पर तीर नट,कुदि गयो क्षण वीर॥ 2 ॥
खावण द्रोणाचळ खमै, समै न धारण शंक।
वाळण सुध सीता वळै, लिवि प्रजाळै लंक॥ 3 ॥
पंचवटी वन पालटी, सीत हरण शोधंत।
अपरम शंके धाहियो, हेत करै हडमंत॥ 4॥

                             छंद त्रिभंगी ।

मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी, परसंगी।
सुग्रीव सथंगी, प्रेम पथंगी, शाम शोरंगी, करसंगी।
दसकंध दुरंगी, झुंबै झंगी, भड राखस जड थड भंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 1 ॥
अवधेश उदासी, सीत हरासी, शोक धरासी, सन्यासी।
अणबखत अक्रासी, बोल बंधासी, लंक विळासी, सवळासी।
अंजनी रुद्राशी, कमर कसंसी, साहर त्रासी, तौरंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 2 ॥
करजोड कठाणं, पाव प्रमाणं, दधि प्रमाणं, भरडाणं।
भचकै रथ भाणं, धरा ध्रुजाणं, शेष समाणं साताणं।
गढलंक ग्रहाणं, एक उडाणं, पोच जवाणं, प्रेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 3 ॥
हलकार हतूरं, फौज फतूरं, सायर पूरं संपूरं।
कर रुप करुरं,वध वकरुरं, त्रहकै घोरं, रणतूरं।
जोधा सह जुरं, जुध्ध जलुरं, आगैवानं, ओपंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 4 ॥
आसो अलबेली, बाग बणेली, घटा घणेली, गहरेली।
चौकोर भरेली, फूल चमेली, लता सुगंधी, लहरेली।
अंजनि कर एली, सबै सहेली, हेम हवेली, होमंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 5॥
नल नील तेडाया, गरव न माया सबै बुलाया, सब आया।
पाषाण मंगाया, पास पठाया, सब बंदर लारे लाया।
पर मारग पाया, राम रिझाया, हनुए धाया, हेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 6॥
लखणेश लडातं, सैन धडातं, मुरछा घातं, मधरातं।
साजा घडी सातं, वैद वदातं, प्राण छंडातं, परभातं।
जोधा सम जातं, जोर न मातं, ले हाथं बीडो लंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 7॥
हनुमंत हुंकारं, अनड अपारं, भुजबळ डारं, भभकारं।
कर रुप कराळं, विध विकराळं, द्रोण उठारं, निरधारं।
अमरं लीलारं, भार अढारं, लखण उगारं, दधि लंघी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 8 ॥
सिंदूर सखंडं, भळळ भखंडं, तेल प्रचंडं, अतडंडं।
किय हार हसंडं, अनड अखंडं, भारथ डंडं, भुडंडं।
चारण कुळ चंडं, वैरि विहंडं , प्रणवै कानड कवि पंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी ॥ 9
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माँ चालकनेश रा दोहा

.              माँ चालकनेश रा दोहा 


ऊक्ती देवण आवड़ा, मोटि सगत महमाय  ।
उर मै विद्यया आपजे , चालकने री राय ।।1।।
धज बंधण धाम धरा पर, नाम पुजै नवखण्ड ।
आई  थारै  आसरे , भूमी अर भृह्मण्ड ।।2।।
वाघ वाहणी विसहथ्थी , हाथ त्रिशूल हजार ।
पूजै आखी परथमी , अपणी तुह ओधार ।।3।।
धर अम्बर मोटो धणी ,  मोटो भाण महान ।
उण सौ मोटी आवड़ा , देवी गढ़ देशाण ।।4।।
मामड़ रै घर मावड़ी, आय लियौ अवतार ।
मनरंग थल मोटो कियौ , भुमी उतारण भार ।।5।।
सेवग झाली सेवना , मोटि जाळ मनरंग ।
काटे कष्ट विघन हटे , आंगण हो उचरंग ।।6।।
ऊर भर विध्या आवड़ा , डावड़ थारो दास ।
अवल रखे नित अम्बिका , पहलो कीजै पास ।।7।।
दुहा छन्द कवता दिजै , किजै सफल सब काम ।
सेण तणी कर सायता , अवल रखे मम नाम ।।8।।
चालक विनती सांभले , बाळक री बाणीह ।
आप सिवा कुण आपणो , चालक सुरराणीह ।।9।।
जाणी आखे जगत में , प्रथम तुह पुजाणीह ।
हिंगळा ऊपर हेत थी , मैहर धणियाणीह।।10।।
क्रमशः
 हिंगलाज पुत्र तेजदान ओगाळा
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Monday, 7 November 2016

महेडु

बहुत से भाइयों को, विशेष कर नवयुवक मेहड़ू भाइयों को यह क्रमवार जानकारी हो या न हो,, लेकिन तथ्यों की गहराई और इतिहास एवं इस कुल के बही भाटों के साक्ष्य पूर्वक अध्ययनों से यह प्रमाणिक और प्रमाणित होता है कि मेड़वा जो कि मेहड़ू जी केशरिया ने बसाया था, यहाँ से एक नई शाखा मेहड़ू अस्तित्व में आई, कालान्तर में समयानुसार लोग पलायन करते गये मेड़वा से कुछ लोग बीकानेर चुरू सीकर तक चले गए, कुछ लोग पारकर जो कि पशु पालन और पानी के लिए सुरक्षित स्थान कहा जाता था, उस तरफ चले गए, पारकर से समय समय पर लोग काठियावाड़ और सौरास्ठ की तरफ गये, मेहड़ू जाति को प्रसिद्धि और पद काठियावाड़ में सबसे ज्यादा मिले, लूनपाल जी, गोदड जी, लांगी दास जी, और वजमाल जी ने बहुत ख्याति पाई, महाराणा उदय सिंह की एक शादी ध्रांगधरा के झाला राजपूतों में हुई थी, इस क्रम में हमारे पूर्वजों का राजा महाराजाओं के साथ मेवाड़ में आना जाना रहा, यहाँ मेवाड़ में और ईडर में भी मेहड़ू का निवास स्थान हो गया,, आगे चल कर महाकर्ण जी मेहड़ू बाड़ी से सरस्या और महाकवि महा दान जी को मारवाड़ में भी जागीरी प्राप्त हुई, इस प्रकार हमारी जनसँख्या का अधिकांश भाग पारकर और काठियावाड़ में पाया जाता है, राजस्थान में खारी को छोड़ कर बाकि सब छोटे छोटे गाँव है ।पारकर में मेहड़ू की एक समय सबसे ज्यादा आबादी थी इसमें गढ़ समोवड़ गूंगड़ी, उंडेर राठी और डीनसी, मेहड़ू शाखा के बड़े बड़े गाँव थे, पर धीरे धीरे लोग काठियावाड़ चले गए,, उसका मुख्य कारण पारकर के सोढा राजपूतो और काठियावाड़ के राजपूतों के बीच अधिकांश रिस्तेदारी का होना।सबसे पहले डिनशी से कवि श्री डूंगरसी मेहड़ू जी का परिवार गया था, उनको देगाम की जागीरी मिली थी, फिर क्रम बढ़ता ही गया, इस प्रकार हमें मालूम होना चाहिए कि सौरास्ठ, काठियावाड़ ईडर मारवाड़ में ही मेहड़ू शाखा का निवास स्थान है,, 1971 और  विभाजन के समय पारकर से पूरे मेहड़ू पलायन कर गए है, किसी समय में पारकर mehduo की शक्ति और सत्ता का केंद्र रहा आज मेहड़ू विहीन है, आज इतना ही, फिर इतिहास पर बातें करते रहेंगे,, जय माँ चालकनेची जी
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