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Thursday, 26 April 2018

श्री कानदास जी मेहड़ू कृत विरवड़ी जी रो छंद

श्री कानदास जी मेहड़ू कृत विरवड़ी जी रो छंद

बिरवडी जी रा छंद –
॥दोहा॥
तुं दीधा नूं देव, नरही लीधा नूं नही।
गरवी मां गंगैव, बिरद तुहाळौ बिरवडी॥ 1 ॥
निवत कटक नव लाख, जिण नवघण जिमाडियो।
सुरज शशिहर शाख, बिरद तुहाळौ बिरवडी॥ 2 ॥

॥छंद सारसी (हरिगीत)॥
दांतां बतीसां सौत जाई, लिया दांत सु लोहरा।
अचरज्ज दरशण हुऔ अंबा, मिट्या वादळ मोहरा।
पख दोय पूरी शगत सूरी,पिता हुकम पर वडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 1 ॥

नव लाख घोडे चढै नवघण, सूमरां घर सल्लडै।
सर सात खळभळ, शेष सळवळ, चार चकधर चल्लडै।
इण रुप चढियो सिंध धरपर इळा रज अंबर अडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 2 ॥

बायां ते रमवा वेश बाळै नेस हूंतां निसरी।
माहेश दादो शेश मामो इम्म दुय पख ऊजळी।
देशौत नवघण निमत जिण दिन, चाढ नांनी चरवडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 3 ॥

सह देव समवड आप समवड चोज राखण वड चडी।
तासळां कीधां पान त्रोडै,घणै समचै तिण घडी।
कोइ कळा बिरवड धपै कटकड किया तरपत कुल्लडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 4॥

अन घिरत अण थह चरु एकण पोहर सहदळ पोंखिया।
कइ वार जीमण कटक पडकै समद जळ घण शोखिया।
उण वार दह मैं नांख आखा, उबकै जळ उण घडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 5 ॥

दळवाट वहतां कह्यो दवियण थाट ऐ कुण थंभवै।
मुख नाट बोल्यौ जाट मद सूं हाट बळहट किम हुवै।
सुण फेर दिन समराट फिरसी घाट अवळै तिण घडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 6 ॥

चित्तौड गढ हम्मीर गढपत, थाग को पिंड कोढ रो।
पोहो सजै रथ छौड परसण नेस संखडा निसरो।
परभात बिरवड लगो पावां गयो कोढज तिणघडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 7॥

कापडी लख जात कारण एकठां हिज आविया।
दोहणे हेकण तुंहीज देवी पंथ बहतां पाविया।
सत धिनो बिरवड कळा सहको प्रसिध नवखंड पर वडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 8 ॥

भुवा घर निज नार भाळी राब छिल्ली रांधणी।
भण भुण देखत खाण भरियल जांण सासु अडवडी।
चंखडा सधू जो आद चारण वळै तुं मन वरवडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी ॥ 9॥

कामाई तुंही तुंही करनल आद तुंही आवडा।
सहदेव तुंही तुंही शेणल खरी देवल खूबडा।
बड देव वडीआं पाट बिरवड लियां नवलख लोवडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥10॥

॥छप्पय॥
सुमरंता सेवतां, पंथ वहतां पाळंता।
गुण गीतां गावतां, मिटै चिन्ता मागंता।
धीणां धानां ध्रवै, नवै निध आवै  नेसां।
पत राखण पाळणी, देश देशांN परदेशां।
चंखडा सधू कान्हड चवै, जेण सुजस छायो जमी।
बिरवडी दियण पातां वळां, सूरज उगंतां समी॥ 1 ॥

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Tuesday, 8 August 2017

खरो परचो खोडली चारण कवि श्री कानदास महेडु

🌱🌱🌱🙏🌱🌱🌱

      खरो परचो खोडली

चारण कवि श्री कानदास महेडु

तेमणे भूज नी व्रज भाषा नी पाठशाळा मां अभ्यास कर्यो हतो

कवि नु जन्म इ स 1757
मृत्यु इ स 1859

टाइप हरि गढवी
गाम ववार
ता मुंन्द्रा    कच्छ
मो  96380 41145

                    दुहो

पसा उक्त दे गणपति सधबध नाअक साम
आद शक्त गण उचारुं प्रथम करुं प्रणाम

मामडिया मादा तणी चडतुं रखण चकार
मेखासुर हणवा मैया तें सज कीधो शणगार

                     छंद

ते शणगार धवा, किउ सजवा, दूत भजवा डारंणं
डहकिया छाकं, रुंड डाकं, विरहाकं वारणां
फेट मां अरचो, करण परचो, मीयण चोपड धलमली
शरमोड शरचो, अळां अरचो, खरो परचो खोडली

तण वखत झोळा, मळे टोळा, नवेलख सोळा नुधि
मळे रुद्राणी, ब्रह्माणी, व्रशनाणी थे वृद्धि
कोयलावाळी, महाकाळी, खपराळी तां खळी
      सरमोड सरचो,,,,,,

भडइउ साखर, भणंक भाखर, खमंड पाखर खेतलो
धूमती ढेली, रमत धेली, बांआं बेली ब्रझलु
आदि अनादि, जोरे जादी, चंडीका मादी चली
       सरमोड सरचो,,,,,,,,

धुधरुं धमके, चूड चमके, चलत ठमंके, चंडिका
हींडळे सारे, कंठहारं, मुक्तसारं मंडिका
झालरुं झळके, वेण वळके, बेहद भळके बंदली
       सरमोड सरचो,,,,,,

रमझोळ रममं, ठोर ठमंमं, धोर धममं, गाजिअं
सोहे सकोमळ, अंग उजळ, रेख काजळ व्राजीअं
भाल सिदूरं, भरपूरं अरक, नूर ओडली
            सरमोड सरचा,,,,,,

वधपना वळळ जोतझळळळ, भजे भळळळ भेळियो
सुधा समोहं अंग सोहम् बोह डोहंब कियो
झुलरां खोडी, रम जोडी, छप्पन कोडी सरछली
          सरमोड सरचो,,,,,,,,

त्रसूळ त्रछट, अरि अछट, प्रथी पटे पाडे दिउ
दोह वाट अडडड, रगत दडडड, मरड मेखो मारिउ
भर पत्र कुंडां, थइ भ्रेकूडां, रुड मुंडा रोडली
            सरमोड सरचो,,,,,,

जेकार थाहर, जगत जाहर, सदा वाहर सेवगां
उपटे धावे, मैआ आवे, लज रहावे देलगां
वधार वानड, अख आनंड, भणे कानड भणी
शरमोड शरचो, अळां अरचो, खरो परचो खोडली

                  छप्पय

खरी देव खोडल, वदे जस जगत वचाळे
खरी देव खोडल, भोवण परचो जग भाळे
खरी देव खोडल, नीयणां दलद्र निवारण
खरी देव खोडल, मतंग मेखासुर मारण
चारण वरण राखत चडा, अळ मादाकुळ अवतरी
करजोड कान महेडु कहे, खोडल देवी हे खरी जीय खोडद देवी हे खरी

🌱🌱🌱🙏🌱🌱🌱

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कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना

*कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना*

                          *दोहा*

सुरस्वती उजळ अती, वळि उजळी वाण।
करु प्रणाम जुगति कर, बाळाजती बखाण॥1॥

अंश रुद्र अगियारमो, समरथ पुत्र समीर।
नीर निधि पर तीर नट,कुदि गयो क्षण वीर॥ 2 ॥

खावण द्रोणाचळ खमै, समै न धारण शंक।
वाळण सुध सीता वळै, लिवि प्रजाळै लंक॥ 3 ॥

पंचवटी वन पालटी, सीत हरण शोधंत।
अपरम शंके धाहियो, हेत करै हडमंत॥ 4॥

                         *छंद त्रिभंगी।*

मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी, परसंगी।
सुग्रीव सथंगी, प्रेम पथंगी, शाम शोरंगी, करसंगी।
दसकंध दुरंगी, झुंबै झंगी, भड राखस जड थड भंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 1 ॥

अवधेश उदासी, सीत हरासी, शोक धरासी, सन्यासी।
अणबखत अक्रासी, बोल बंधासी, लंक विळासी, सवळासी।
अंजनी रुद्राशी, कमर कसंसी, साहर त्रासी, तौरंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 2 ॥

करजोड कठाणं, पाव प्रमाणं, दधि प्रमाणं, भरडाणं।
भचकै रथ भाणं, धरा ध्रुजाणं, शेष समाणं साताणं।
गढलंक ग्रहाणं, एक उडाणं, पोच जवाणं, प्रेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 3 ॥

हलकार हतूरं, फौज फतूरं, सायर पूरं संपूरं।
कर रुप करुरं,वध वकरुरं, त्रहकै घोरं, रणतूरं।
जोधा सह जुरं, जुध्ध जलुरं, आगैवानं, ओपंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 4 ॥

आसो अलबेली, बाग बणेली, घटा घणेली, गहरेली।
चौकोर भरेली, फूल चमेली, लता सुगंधी, लहरेली।
अंजनि कर एली, सबै सहेली, हेम हवेली, होमंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 5॥

नल नील तेडाया, गरव न माया सबै बुलाया, सब आया।
पाषाण मंगाया, पास पठाया, सब बंदर लारे लाया।
पर मारग पाया, राम रिझाया, हनुए धाया, हेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 6॥

लखणेश लडातं, सैन धडातं, मुरछा घातं, मधरातं।
साजा घडी सातं, वैद वदातं, प्राण छंडातं, परभातं।
जोधा सम जातं, जोर न मातं, ले हाथं बीडो लंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 7॥

हनुमंत हुंकारं, अनड अपारं, भुजबळ डारं, भभकारं।
कर रुप कराळं, विध विकराळं, द्रोण उठारं, निरधारं।
अमरं लीलारं, भार अढारं, लखण उगारं, दधि लंघी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 8 ॥

सिंदूर सखंडं, भळळ भखंडं, तेल प्रचंडं, अतडंडं।
किय हार हसंडं, अनड अखंडं, भारथ डंडं, भुडंडं।
चारण कुळ चंडं, वैरि विहंडं , प्रणवै कानड कवि पंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी ॥ 9

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मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी, परसंगी।

मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी,
परसंगी।
सुग्रीव सथंगी, प्रेम पथंगी, शाम शोरंगी,
करसंगी।
दसकंध दुरंगी, झुंबै झंगी, भड राखस जड थड
भंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥1॥

अवधेश उदासी, सीत हरासी, शोक धरासी,
सन्यासी।
अणबखत अक्रासी, बोल बंधासी, लंक विळासी,
सवळासी।
अंजनी रुद्राशी, कमर कसंसी, साहर त्रासी,
तौरंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥2॥

करजोड कठाणं, पाव प्रमाणं, दधि प्रमाणं,
भरडाणं।
भचकै रथ भाणं, धरा ध्रुजाणं, शेष समाणं साताणं।
गढलंक ग्रहाणं, एक उडाणं, पोच जवाणं,
प्रेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥3॥

हलकार हतूरं, फौज फतूरं, सायर पूरं संपूरं।
कर रुप करुरं,वध वकरुरं, त्रहकै घोरं, रणतूरं।
जोधा सह जुरं, जुध्ध जलुरं, आगैवानं, ओपंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥4॥

आसो अलबेली, बाग बणेली, घटा घणेली, गहरेली।
चौकोर भरेली, फूल चमेली, लता सुगंधी,
लहरेली।
अंजनि कर एली, सबै सहेली, हेम हवेली,
होमंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥5॥

नल नील तेडाया, गरव न माया सबै बुलाया, सब
आया।
पाषाण मंगाया, पास पठाया, सब बंदर लारे लाया।
पर मारग पाया, राम रिझाया, हनुए धाया,
हेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥6॥

लखणेश लडातं, सैन धडातं, मुरछा घातं, मधरातं।
साजा घडी सातं, वैद वदातं, प्राण छंडातं,
परभातं।
जोधा सम जातं, जोर न मातं, ले हाथं बीडो लंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥7॥

हनुमंत हुंकारं, अनड अपारं, भुजबळ डारं,
भभकारं।
कर रुप कराळं, विध विकराळं, द्रोण उठारं,
निरधारं।
अमरं लीलारं, भार अढारं, लखण उगारं, दधि
लंघी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥8॥

सिंदूर सखंडं, भळळ भखंडं, तेल प्रचंडं, अतडंडं।
किय हार हसंडं, अनड अखंडं, भारथ डंडं, भुडंडं।
चारण कुळ चंडं, वैरि विहंडं , प्रणवै कानड
कवि पंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी,
बजरंगी॥9 ।।

*~~कानदासजी मेहडु~~*

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Friday, 14 July 2017

कवि कानदास मेहडू नी एक रचना* (नीचे सरळ समजूति आपी छे)

*कवि कानदास मेहडू नी एक रचना*
(नीचे सरळ समजूति आपी छे)

आगुसे धसीऐ ना, धसीऐ तो खसीऐ ना,
शुर के समीप जाके, मारीऐ के मरीऐ,
बुद्धि विना बोलिये ना, बोलिये तो डोलीये ना,
बोल ऎसो बोलिये के बोलीये सो कीजीये,
अजाण प्रीत जोड़ीये ना, जोड़ीये तो तोड़ीये ना,
जोड़ ऐसी जोड़िए के जरियानमें जड़ीये,
कहे कवि कानदास, सुनोजी बिहारी वलाल,
ओखले में शिर डाल, मोसलेसे डरीये ना

- - > आगेवानी लेवी नही अने लेवी तो अधवच्चे छोड़ी न देवी,
शूरवीर साथे जवु तो मारीऐ कां मारीये,
बुद्धिथी विचार्या विना बोलवु नही,
बोल्या पछी फरवु नही,
ऐटलु ज बोलवुं जोइये के जे वर्तन करी शकाय,
अजाण्या साथे संबंध बांधवो नहीं,
अने जो संबध स्थापित थाय तो ऐने नजीवा कारणथी तोड़वो नही, जो सबंध जोड़वानो थाय तो कापड़ पर भरतकाम करीऐ तेम ओतप्रोत थई जंवु जोइए,
कवि कानदास बिहारीदास ने कहे छे
खांडणीआमां मस्तक मुक्या पछी सांबेलाना घा थी डराय नहीं.

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Saturday, 18 March 2017

कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना

*कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना*

सुरस्वती उजळ अती, वळि उजळी वाण।
करु प्रणाम जुगति कर, बाळाजती बखाण॥1॥

अंश रुद्र अगियारमो, समरथ पुत्र समीर।
नीर निधि पर तीर नट,कुदि गयो क्षण वीर॥ 2 ॥

खावण द्रोणाचळ खमै, समै न धारण शंक।
वाळण सुध सीता वळै, लिवि प्रजाळै लंक॥ 3 ॥

पंचवटी वन पालटी, सीत हरण शोधंत।
अपरम शंके धाहियो, हेत करै हडमंत॥ 4॥

                   *छंद त्रिभंगी ।*

मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी, परसंगी।
सुग्रीव सथंगी, प्रेम पथंगी, शाम शोरंगी, करसंगी।
दसकंध दुरंगी, झुंबै झंगी, भड राखस जड थड भंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 1 ॥

अवधेश उदासी, सीत हरासी, शोक धरासी, सन्यासी।
अणबखत अक्रासी, बोल बंधासी, लंक विळासी, सवळासी।
अंजनी रुद्राशी, कमर कसंसी, साहर त्रासी, तौरंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 2 ॥

करजोड कठाणं, पाव प्रमाणं, दधि प्रमाणं, भरडाणं।
भचकै रथ भाणं, धरा ध्रुजाणं, शेष समाणं साताणं।
गढलंक ग्रहाणं, एक उडाणं, पोच जवाणं, प्रेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 3 ॥

हलकार हतूरं, फौज फतूरं, सायर पूरं संपूरं।
कर रुप करुरं,वध वकरुरं, त्रहकै घोरं, रणतूरं।
जोधा सह जुरं, जुध्ध जलुरं, आगैवानं, ओपंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 4 ॥

आसो अलबेली, बाग बणेली, घटा घणेली, गहरेली।
चौकोर भरेली, फूल चमेली, लता सुगंधी, लहरेली।
अंजनि कर एली, सबै सहेली,होम हवेली, होमंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 5॥

नल नील तेडाया, गरव न माया सबै बुलाया, सब आया।
पाषाण मंगाया, पास पठाया, सब बंदर लारे लाया।
पर मारग पाया, राम रिझाया, हनुए धाया, हेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 6॥

लखणेश लडातं, सैन धडातं, मुरछा घातं, मधरातं।
साजा घडी सातं, वैद वदातं, प्राण छंडातं, परभातं।
जोधा सम जातं, जोर न मातं, ले हाथं बीडो लंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 7॥

हडमत हुंकारं, अनड अपारं, भुजबळ डारं, भभकारं।
कर रुप कराळं, विध विकराळं, द्रोण उठारं, निरधारं।
अमरं लीलारं, भार अढारं, लखण उगारं, दधि लंघी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 8 ॥

सिंदूर सखंडं, भळळ भखंडं, तेल प्रचंडं, अतडंडं।
किय हार हसंडं, अनड अखंडं, भारथ डंडं, भुडंडं।
चारण कुळ चंडं, वैरि विहंडं , प्रणवै कानड कवि पंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी ॥ 9॥

*Narpatdan Charan Kaviraj:*

*डिंगळ री डणकार से सादर त्रिभंगी छंद ।*

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Saturday, 4 February 2017

हीगळाज माताजीनों छपय

.              हीगळाज माताजीनों छपय
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खप्पर गयु खोवाई के (तारी) साथ कोई बाई न सुंडी
सुर गयु संताय के भांग आरोगाई भेंकुडी
घणी उघ घेराई के खेराई करन मां
त्रुटे गयो त्रीसुळ के वाघ छुयेगयो वनमां
कोयला तणी दल थई कठण के ताप कळु लाग्यो तुही
कयव का कान कहे डुढी कठे हे हीगळाज बुढढी हुई.
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       रचीयता:- कानदासजी महेडु, सामरखा.
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Monday, 19 December 2016

कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना


.         कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना
       
                              दोहा

सुरस्वती उजळ अती, वळि उजळी वाण।
करु प्रणाम जुगति कर, बाळाजती बखाण॥1॥
अंश रुद्र अगियारमो, समरथ पुत्र समीर।
नीर निधि पर तीर नट,कुदि गयो क्षण वीर॥ 2 ॥
खावण द्रोणाचळ खमै, समै न धारण शंक।
वाळण सुध सीता वळै, लिवि प्रजाळै लंक॥ 3 ॥
पंचवटी वन पालटी, सीत हरण शोधंत।
अपरम शंके धाहियो, हेत करै हडमंत॥ 4॥

                             छंद त्रिभंगी ।

मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी, परसंगी।
सुग्रीव सथंगी, प्रेम पथंगी, शाम शोरंगी, करसंगी।
दसकंध दुरंगी, झुंबै झंगी, भड राखस जड थड भंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 1 ॥
अवधेश उदासी, सीत हरासी, शोक धरासी, सन्यासी।
अणबखत अक्रासी, बोल बंधासी, लंक विळासी, सवळासी।
अंजनी रुद्राशी, कमर कसंसी, साहर त्रासी, तौरंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 2 ॥
करजोड कठाणं, पाव प्रमाणं, दधि प्रमाणं, भरडाणं।
भचकै रथ भाणं, धरा ध्रुजाणं, शेष समाणं साताणं।
गढलंक ग्रहाणं, एक उडाणं, पोच जवाणं, प्रेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 3 ॥
हलकार हतूरं, फौज फतूरं, सायर पूरं संपूरं।
कर रुप करुरं,वध वकरुरं, त्रहकै घोरं, रणतूरं।
जोधा सह जुरं, जुध्ध जलुरं, आगैवानं, ओपंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 4 ॥
आसो अलबेली, बाग बणेली, घटा घणेली, गहरेली।
चौकोर भरेली, फूल चमेली, लता सुगंधी, लहरेली।
अंजनि कर एली, सबै सहेली, हेम हवेली, होमंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 5॥
नल नील तेडाया, गरव न माया सबै बुलाया, सब आया।
पाषाण मंगाया, पास पठाया, सब बंदर लारे लाया।
पर मारग पाया, राम रिझाया, हनुए धाया, हेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 6॥
लखणेश लडातं, सैन धडातं, मुरछा घातं, मधरातं।
साजा घडी सातं, वैद वदातं, प्राण छंडातं, परभातं।
जोधा सम जातं, जोर न मातं, ले हाथं बीडो लंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 7॥
हनुमंत हुंकारं, अनड अपारं, भुजबळ डारं, भभकारं।
कर रुप कराळं, विध विकराळं, द्रोण उठारं, निरधारं।
अमरं लीलारं, भार अढारं, लखण उगारं, दधि लंघी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 8 ॥
सिंदूर सखंडं, भळळ भखंडं, तेल प्रचंडं, अतडंडं।
किय हार हसंडं, अनड अखंडं, भारथ डंडं, भुडंडं।
चारण कुळ चंडं, वैरि विहंडं , प्रणवै कानड कवि पंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी ॥ 9
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Thursday, 27 October 2016

श्री कानदासजी महेडु 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम में योगदान

चारणकविश्रीकानदासमहेडुका1857केस्वातंत्र्यसंग्राममेंयोगदान-

कानदास महेडु ने 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य में गुजरात के राजवीओं को ब्रितानियों के विरूद्ध आंदोलन छेड़ने के लिए प्रेरित किया हो और इसके कारण उनको फाँसी की सजा फरमाई गई हों ऐसी संभावनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त ब्रितानियों के विरूद्ध शस्त्र उठाने वाले सूरजमल्ल को उन्होंने आश्रय दिया था। इसके कारण उनका पाल गाँव छीन लिया गया था। इस संदर्भ में कुछेक दस्तावेज भी उपलब्ध होते हैं। प्रसिद्ध इतिहासविद् श्री रमणलाल धारैया ने यह उल्लेख किया है कि "खेडा जिले के डाकोर प्रदेश के ठाकोर सूरजमल्ल ने 15 जुलाई 1857 के दिन लुणावडा को मदद करने वाली कंपनी सरकार के विरूद्ध आंदोलन किया था। बर्कले ने उनको सचेत किया था किन्तु सूरजमल्ल ने पाला गांव की जागीरदार और अपने मित्र कानदास चारण और खानपुर के कोलीओं की सहायता से विद्रोह किया था। मेजर एन्डुजा और आलंबन की सेना द्वारा सूरजमल्ल और कानदास को पकड़ लेने के बाद उनको फाँसी की सजा दी गई और सूरजमल्ल मेवाड की ओर भाग निकले थे। आलंबन और मेजर एडूजा ने पाला गांव का संपूर्ण नाश किया था।"

डॉ. आर. के. धारैया ने 1857 इन गुजरात नाम ब्रिटिश ग्रंथ में भी उपर्युक्त जानकारी दी है। और अपने समर्थन के लिए Political depertment volumes में से आधार प्रस्तुत कर यह जानकारी दी है। इससे श्रद्धेय जानकारी मिलती है कि कानदास महेडु ने 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम में योगदान दिया था। अलबत्ता यहाँ Kands charan और Pala का अंग्रेजी विकृत नाम है।

ब्रितानियों ने हमारे अनेक गाँवों के नाम अपने ढंग से उल्लेखित किये हैं। इसके लिए यहाँ बोम्बे, बरोडा, खेडा, अहमदाबाद, भरूच, कच्छ इत्यादि संदर्भों को उद्धृत किया जा सकता है। इससे यह पता लगता है कि कानदास महेडु अर्थात् कानदास चारण और Pala अर्थात् पाला एक ही है।

'चरोतर सर्वे संग्रहे' के लेखक पुरूषोत्तम शाह और चंद्रकांत कु. शाब भी यह उल्लेख करते है किं " कानदास महेडु सामरखा 1813 में संत कवि के रूप में सुप्रसिद्ध हुएं थे। 1857 के आंदोलन के बाद उनको आंदोलनकारियों को मदद करने के कारण पकड़ लिया गया था। कहा जाता है कि कवि ने जेल में देवों और दरियापीर की स्तुति गा कर अपनी जंजीरें तोड़ डाली थीं। इस चमत्कार से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने उनको छोड़ दिया था।"

1857 के स्वातंत्र्य संग्राम में कानदास का गाँव जप्त कर लेने के दस्तावेजी आधार भी हैं। कवि ने कैद मुक्त होने के बाद अपना गांव वापस प्राप्त करने हेतु किया हुआ पत्राचार भी मिलता है। सौराष्ट्र युनिवर्सिटी के चारण साहित्य हस्तप्रत भंडार में कानदास महेडु के इस प्रकार के दस्तावेज संग्रहीत हैं। अपने आप को ब्रितानियों की कैद से मुक्त करने हेतु दरियापीर की स्तुति करते हुए रचे गए छंद भी मिलते हैं।

ब्रितानियों ने कानदास को कैद कर उनको गोधरा की जेल में रखा था और उनके हाथ-पाँव में लोहे की भारी जंजीरें डालकर अंधेरी कोठरी में रखा गया था। अतः कवि ने अपने आपको मुक्त करने के लिए दरियापीर की स्तुति के छंद रचे और ब्रितानियों के सामने ही उनके कदाचार तथा अनुचित कार्यों को प्रकट किया। इन छंदो में कुछेक उदाहरण उद्धृत हैं-

अचणंक माथे पडी आफत, राखत केदे सोंप्यो;
वलि हलण चलण अति त्रिपति थानक जपत थियो;
दुल्ला महंमद पीर दरिया, भेर कर बेडिय भगो...

(अचानक मुझ पर मुश्किल आई और कैद किया गया जहाँ बंधनों के कारण हवा में हलनचलन अति कष्टदायी बन गया और साथ ही मेरा गाँव (पाड़ला) भी जप्त किया गया। इस प्रकार मेरा मन घनघोर चिंताग्रस्त हुआ। इस परिस्थिति में ताकत कहां तक चल सकती थी। दरियापीर मेरी सहायता कर मेरी जंजीर तोड़ो।)

भूडंड कोप्यो भूरो, धार केहडो तिण घड़ी;
लोहा रा नूधी दियां लंगर, कियो कबजे कोटडी;
तिणे परे जडिया सखत ताला, उपर पैरो आवगो 
दुल्ला महमंद पीर दरिया, भेर कर बेडिय भगो...

(धरती के खंभे जैसा दृष्ट ब्रिटिश अमलदार मुझ पर कोपायमान हुआ उस समय मेरी स्थिति कैसी हुई? हाथ-पाँव में लोहे की जंजीरें बाँधकर मुझे अंधेरी कोठरी में डाला गया और सख़्त ताला बंदी के उपरांत चौकीदार तैनात किया गया है। अतः हे दरियापीर मेरी मदद कीजिए।) ब्रितानियों के सामने ही उनकी भाषा, वेशभूषा अभक्ष्य खानपान आदि का उल्लेख करतें हुए कवि कहते हैं-

कलबली भाषा पेर कुरती, महेर नहीं दिल मांहिया;
तोफंग हाथ ने सीरे टोपी, सोइ न गणे सांइया;
हराम चीजां दीन हिंदु, लाल चेरो तण लगो 
दुल्ला महमंद पीर दरिया, भेर कर बेडिय भागो...

(जो समझ में न आए ऐसी (कलबली) भाषा बोलते है और कुर्ता (पटलून) पहनते हैं वे निर्दयी और निष्ठुर हैं। हाथ में बंदूक और सिर पर टोपी रखते हैं, हिन्दू और मुसलमानों के लिए जो अग्राह्य है उस गाय और सुअर का मांस वे खाते हैं और लाल चहरे वाले हैं।)

शाखा न खत्री नहीं सौदर वैश ब्रम व कुल वहे;
हाले न मुसलमान हींदवी, कवण जाति तिण कहे,
असुध्य रहेवे खाय आमख, नाय जलमां होय नगो 
दुल्ला महमंद पीर दरिया, भेर कर बेडिय भागो...

(जिसके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसे कर्म नहीं है। हिन्दू या इस्लाम धर्म को मानते नहीं हैं, उसे किस जाति का मानना चाहिए। वे ब्रिटिश अपवित्र रहन-सहन, भ्रष्ट करने वाले और मांसाहारी है और निर्लज्जता से जल में नग्न स्नान करते हैं।)

इस तरह, कवि ने पाँच भियाखरी छंद, नौ गिया मालती छंद और एक छप्पय की रचना कर ब्रितानियों की उपस्थिति में दरियापीर की स्तुति की। लोक मान्यता के अनुसार इस छंद को बोलते समय तीन-तीन बार कानदासजी की जंजीर टूट गई। किन्तु लोक मान्यता को हम ज्यादा महत्व न दें फिर भी यह घटना ब्रितानियों के सम्मुख ही उनके कदाचार, अत्याचार और असंस्कारिता को खुले आम प्रकट करने की कवि की हिमम्मत, उनकी निडरता और सत्यप्रिय स्वभाव की प्रतीति कराती है।

ग्यारह मास की जेल के बाद कवि कानदासजी पर कानूनी कारवाई हुई, उनको प्राणदंड की सजा हुई, उनको तोप के सामने खड़ा रखा गया किन्तु तोप से विस्फोट नहीं हुआ। इससे या और कुछ कारण से कवि को ब्रितानियों ने मुक्त किया, उनका पाला गांव वापस नहीं किया।

सजा मुक्त हुए कानदासजी को वडोदरा के श्री खंडेराव गायकवाड़ ने अपने यहाँ राजकवि के रूप में रखा। उत्तरावस्था में उनका मान-सम्मान वृद्धि होने पर लूणावाड़ा के ठा. दलेलसिंह ने संदेश भेजा कि आपको पाला गांव वापस देना है, उसे स्वीकार करने हेतु पधारकर लूणावाड़ा की कचहरी पावन कीजिए। अलबत्ता दलेलसिंह ने 1857 में ब्रितानियों को मदद कर मातृभूमि के प्रति गद्दारी की थी, इसीलिए, कवि ने गांव वापस प्राप्त करने के बजाए उपालंभ युक्त दोहा लिखकर भेजा-

"रजपूतां सर रूठणो, कमहलां सूं केल;
तू उपर ठबका तणो, मारो दावो नथी दलेल"

इस तरह कवि ने व्यंजनापूर्ण बानी में दलेलसिंह को अक्षत्रिय घोषित किया, क्षत्रिय को डाँटने का चारण का अधिकार है।

कानदास महेडु ने सर्वस्व को दाव पर रखकर मातृभूमि को आजाद करनें के प्रयत्न किये हैं। इसी कारण से ही ब्रितानियों ने स्वातंत्र्य संग्राम के दौरान कवि को कैद में रखकर उनको भारतीय प्रजा से अलग कर दिया गया ताकि वे काव्य सृजन द्वारा समाज में तद्नुरूप माहौल का निर्माण कर न सके।

ब्रिटिश सरकार ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता के बाद तुरंत हिंदुस्तान में हथियार पर पाबंदी लगा दी और उनके लिए अलग कानून बनाया। इसकी वजह से क्षत्रियों को हथियार छोड़ने पड़े। इस वक्त लूणावाड़ा के राजकवि अजित सिंह गेलवाले ने पंचमहाल के क्षत्रियों को एकत्र करके उनको हथियारबंधी कानून का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। सब लूणावाड़ा की राज कचहरी में खुल्ली तलवारों के साथ पहुँचे। मगर ब्रिटिश केप्टन के साथ निगाहें मिलते ही सबने अपने शस्त्र छोड़ दिए और मस्तक झुका लिए। सिर्फ़ एक अजित सिंह ने अपनी तलवार नहीं छोड़ी। ब्रिटिश केप्टन आग बबूला हो उठा और उसने अजित सिंह को क़ैद करने का आदेश दिया। मगर अजित सिंह को गिरफ़्तार करने का साहस किसी ने किया नहीं और खुल्ली तलवार लेकर अजित सिंह कचहरी से निकल गए; ब्रितानियों ने उसका गाँव गोकुलपुरा ज़ब्त कर लिया और गिरफ़्तारी से बचने के लिए अजित सिंह को गुजरात छोड़ना पड़ा। इनकी क्षत्रियोचित वीरता से प्रभावित कोई कवि ने यथार्थ ही कहा है कि-

"मरूधर जोयो मालवो, आयो नजर अजित;
गोकुलपुरियां गेलवा, थारी राजा हुंडी रीत"

कानदास महेडु एवं अजित सिंह गेलवाने साथ मिलकर पंचमहाल के क्षत्रियों और वनवासियों को स्वातंत्र्य संग्राम में जोड़ा था। इनकी इच्छा तो यह थी कि सशस्त्र क्रांति करके ब्रितानियों को परास्त किया जाए। इन्होंने क्षत्रिय और वनवासी समाज को संगठित करके कुछ सैनिकों को राजस्थान से बुलाया था। हरदासपुर के पास उन क्रांतिकारी सैनिकों का एक दस्ता पहुँचा था। उन्होंने रात को लूणावाड़ा के क़िले पर आक्रमण भी किया, मगर अपरिचित माहौल होने से वह सफल न हुई। मगर वनवासी प्रजा को जिस तरह से उन्होंने स्वतंत्रता के लिए मर मिटने लिए प्रेरित किया उस ज्वाला को बुझाने में ब्रितानियों को बड़ी कठिनाई हुई। वर्षो तक यह आग प्रज्जवलित रही।

जिस तरह पंचमहाल को जगाने का काम कानदास चारण और अजित सिंह गेलवा ने किया। इसी तरह ओखा के वाघेरो को प्रेरित करने का काम बाराडी के नागाजी चारण ने किया। 1857 में ब्रितानियों के सामने हथियार उठाने वाले जोधा माणेक और मुलु माणेक को बहारवटिया घोषित करके ब्रितानियों ने बड़ा अन्याय किया है। सही मायने में वह स्वतंत्रता सेनानी थे। आठ-आठ साल तक ब्रितानियों का प्रतिकार करने वाले वाघेर वीरों को ओखा प्रदेश की आम-जनता का साथ था। इस क्रांति की ज्वाला में स्त्री-पुरुषों ने साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। आख़िर जब वह एक छोटे से मकान में चारों ओर से घिर गए थे, तब उनको हथियार छोड़ शरण में आने के लिए कहा गया। सिर्फ़ पाँच लोग ही बचे थे। सब को पूछा गया कि क्या किया जाय? तो तीन लोगों ने शरणागति ही एक मात्र उपाय होने की बात कही। मगर नागजी चारण ने हथियार छोड़ के शरणागत होने के बजाय अंतिम श्वास तक लड़ने की सलाह दी। चारों ओर से गोलियाँ एवं तोप के गोलों की आवाज़ उठ रही थी। उसी क्षण नागजी ने जो गीत गाया, वह आज सौ साल के बाद भी लोगों के रोम-रोम में नई चेतना भरता है। जोधा माणेक और मुलु माणेक हिंदू वाघेर थे, इतना ही नहीं इस गीत को गाने वाला भी चारण था। इसीलिए ओखा जाबेली शब्द का प्रयोग हुआ था। आज उसका अपभ्रंश पंक्ति में 'अल्ला बेली' गाया जाता है। नागजी चारण ने हथियार छोड़ने के बजाय वीरता से मर मिटने की बात करते हुए गाया था कि...

ना छंडिया हथियार, ओखा जा बेली;
ना छंडिया हथियार, मरवुं हकडी वार,
मूलूभा बंकडा, ना छंडिया हथियार...

चारण कवियों कि यह विशिष्ट पंरपरा रही है कि मातृभूमि के लिए या जीवनमूल्यों के लिए अपने प्राण की आहुति देने वाले की यशगाथा उन्होंने गायी है, इनाम, या अन्य लालच की अपेक्षा से नहीं।

इस तरह चारण साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि विदेशी और विधर्मी शासकों के सामने चारण कवियों ने सबसे पहले क्रांति की मशाल प्रज्जवलित की है। 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम से बावन वर्ष पूर्व 1805 में ही बांकीदास आशिया ने ब्रितानियों के कुकर्मो का पर्दाफाश किया था। जोधपुर के राजकवि का उत्तरदायित्व निभाते हुए भी बांकीदास ने ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध आवाज उठाकर अपना चारणधर्म-युगधर्म निभाया था। 1857 से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक शताधिक चारण कवियों ने अपनी सहस्त्राधिक रचनाओं द्वारा भारत के सांस्कृतिक एवं चारणों की स्वातंत्र्य प्रीति का परिचय दिया है।

1857 में स्वतंत्रता के लिए शहीद होने वाले तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब फडनवीस के साथ साथ हर प्रांत में से जिन लोगों ने अपने-अपने प्राणों की आहुती दी है, उनका इतिहास में उल्लेख हो इसीलिए भारतीय साहित्य से या अन्य क्षेत्र से प्राप्त कर विविध आधारों का उपयोग करके नया इतिहास सच्चा इतिहास आलेखित हो यही अभ्यर्थनासह.

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