Wednesday, 23 August 2017

व्रजभाषा पाठशाला (भुज-कच्छ) में अभ्यास किये हुए मेहडू जाती के कवियो की नामांवली

*व्रजभाषा पाठशाला (भुज-कच्छ) में अभ्यास किये हुए मेहडू जाती के कवियो की नामांवली*

1.उदयभान मेहडू
2.उदयभान मालवजी मेहडू
3.कानदासजी मेहडू
4.जबरदानजी मेहडू
5.जीवाभाई गजाभाई मेहडू
6.जीजीभाई मेहडू
7.जेठीभाई केशरभाई मेहडू
8.नवलदान जेताभाई मेहडू
9.ठारणभाई मेहडू
10.पृथ्वीराज खेतदान मेहडू
11.प्रभुदान देवीदानजी मेहडू
12.मावलजी जीवाभाई मेहडू
13.मालवजी मेहडू
14.मूलूभाई मेहडू
15.मोधाभाई मेहडू
16.लागीदासजी मेहडू
17.वजमाल मेहडू
18.सांगाजी मेहडू
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Thursday, 10 August 2017

ढोला ओर मारुई

ढोला ओर मारुई
के शुरा के पंडता , के गरुआ गंभीर ;
नारी नेह नचाडीया , जे जे बावनवीर.....१
       जिसने कीतने शुरा, कीतने पंडीतो ओर अनेक गरवा ओर गंभीर नर ओर नारी को पेृम पास मे बांध के नचाया ऐसे भगवान कामदेव को नमस्कार हो.

पटराणी पीगंळ तणी ; अपछर री अणहारी ;
आछी ऊमा देवडी , सुंदरी अेणी संसारी.....२

          पिंगल राजा की पटराणी ऊमा देवडी ऐ संसार मे सवोॅच्च सुंदरी ओर उप्सरा सरीखी रूपवान नारी थी .

माथुं धोये मेडी, ऊभी सुरज सामंही;
ताइ उपनी पेट, मोहणवेली मारुई.....३
       ऐ राणी उमा देवडी अेक वेळा त्रॅुतुस्नान कर राजमहेल के झरुखे से भगवान सुयॅ सामने खड़ी ओर देवकृपा से राणी के उदर मोहनवेल सरखी मारुई नाम की राजकुमारी जन्मी.

जनम हुवो पुत्री तणो , ओछव हुवो उपार;
उती सुदंर सरूप , अंग पदमण रे अवतार...४
           ए राजकुमारी जन्म से राज्य में आनंद उत्सव हुआ , उतीसुंदर रूप सपृमाण अंगलठवाली राजपुत्री पदमणी का अवतार थी,

भुपत भायो भाटने, कीधो कोृड पशाव ;
चालीयो गढ नरवर भणी, पृणमे पींगलराव...५
        उस समय राजा पिंगल उती आंनदीत हुये ओर कवि भाया बारोट को करोड पसाव से नवाज़ा दीया. तब कविश्वर राजा को सलाम नरवरगढ की ओर चले.

वरस डोढ वोळे पछी, तास अंदृ नह वुठे;
खड पाखेइ लोक खंड , वरतणी गियां अठे..६
  
          जब देढ साल की मारूइ हुइ, उस साल मेघराजा  रिझे नही, ओर घासचारे बिन व्याकुल लोक अपने मालढोर लेके दुष्काल उतारने विदेश चले.

मारुं थाकां देशमां, अेक न भांजे पीड;
को'दि थिअे वृसणुं, काफा कुफा तिड...७

      मारुइ ! तारे देश की अे पीडा कभी टळी ज नहीं , सारा वरस कभी होय , बाकी तो दुष्काल ओर तीड के टोलें ए पृदेश में आते ही रहते है.

पिंगल परियाणी पुछीया, किजे त्रेवड कांइ;
कोयेक  देश अटकळो, जेथ वशीजे जाइ...८

        तब राजा पिंगल ने जाणतल माणुस बुलाके कहा “ कोइ उपाय करो, कोइ देश बतावो जहां हम सब दुष्काल के वसमे दीन बिताने जा बसे ".

खड जल पाखे गो रूआं , देश थियो दकाळ;
पोह करे खड पाणी पृघळ, सं णि पींगळ भूपाल..९

       ऐ पोगळ देश मे सवॅत्र दुष्काल व्याप गया है , भुख तरसी गाये खड-पाणी के अभाव से भांभरडां दे रही ओर पृजाजन कहे “राजा सुणो अब कही बहोले खडपाणी वाले पृदेश दुष्काल उतारने जाइ".
         -----कृमश

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कविस्वर लुणपालजी के ढोलामारु रे दोहे

कविस्वर लुणपालजी के ढोलामारु रे दोहे ( सुफी- उन कामलीवाले, Magu, Sophia - दाशॅनीक , षटवणॅ ) आध्यात्मिक रस रंग अथॅ जीस में ढोला यानी परमात्मा ओर मारुं यानी पृकुती - चित इच्छा शकित एेसा दिव्य अनुभूति के रंग  महात्मा संत कबीर की कबीरवाणी में भी फकत ऐक शब्द का परिवर्तित भक्तिपरक साखीआ मील रही है . ये सुफी आख्यान की आगवी यादी  दे रहे है

  अंबरी कुंजा करलीयां, गरजी भरी सब ताल:
   , ताकु कवण हवाल ,
   अखीयन तै झाँइ पडी, पंथ निहारी निहारी:
   जीभ्या मां छालां पडयां , पिव पुकार पुकारी.     ढोलामारु ( लुणपालजी महेडु )

  अंबरी कुंजा करलीयां, गरजी भरी सब ताल:
   , ताकु कवण हवाल ,
   अखीयन तै झाँइ पडी, पंथ निहारी निहारी:
   जीभ्या मां छालां पडयां , राम पुकार पुकारी.      कबीरवाणी । ( संत कबीर )

भकित कवियत्री मेवाड़ी महाराणी मिरांबाइ जन्म वतन मेडात ओर ससुराल मेवाड- राज. देानो राजवंश चारण ओर चारणी साहित्य के चाहक ओर आश्रयदाता. इन राजकुलो का चारणीसाहीत्य के पृसारण में योगदान न हो तो ही आश्चर्य ! मिरांबाइ की कहाती साखीया ओर भजन में भी ढोलामारु के दोहे मील रहे है.

   कागा ! करक ढंढोळे , करि सब ही खाये मासं:
ऐक न खाये लोयणां, पियु देखण की आस...२२४

कौवा सुण मारु कहे, उडी नरवर जाय :
लेइ हमारी पांसळी, ऊस लोभी देखत खाय.
ढोलामारु ६/१७८ लुणपालजी महेडुं

कागा सब तन खाइओ, चुनचुन खाइओ मांस:
दो नैना मत खाइओ, मोहे हरी मिलन री आस.

हरी ए न बुझी बात, माइ! टेक
काढ कलेजो भोंय धरु हो, रामजी
कौवा तुं ले जाय,
जहाँ देश मोरा पियुं बसत है
वे देखें तु ं खाय ... माइ ३
मिरांबाइ सैा. यु . ह. पृ १५३/३९५१
   इसतरह संत कबीर ओर मिरांबाइ जेसे भक्त कविओ के मुख से पृसारीत हुये ढोलामारु री वात के दुहे से पृभावित वितरागी साधु कुशळलाभजी( वि. १६७७) चोपाईबध्ध कर लिख रहे है,

   “ जे पण पर कवि मुख सांभळी, तिण पर में मन रळी.
दोहा घणा पुराणा अछे, चोपाई बंध कियेा में पछे.”

  ए जैन साधु कवि कुशळलाभजी जेसलमेर के रावल मालदे के पुत्र कुवंर हरराज के काव्य गुरु सहयोगे पृथम डींगल छंद शास्त्रगृंथ पिगंळ शिरोमणी दीया है । जीस मे २३ दुहे , २८ गाथा ओर ७१ पृकार के छप्पय लक्षण उदाहरण सहीत दीये है । ७५ पृकार के उलंकार ओर चित्रकाव्य ओर डींगळ नाममाळा पृकरणपयाॅय वाची शब्दबध्ध संकलन देते हुये ४० डींगळ गीतों के लक्षण दीये है (१६३४) इसी उनुसंधान में महेडु कविराज गोदडजी ने चोवीस उवताररां छंद में चोवीस पृकार के डींगळ छंद उदाहरण दीये है

संकलन - यशवंतजी लांबा
युविवसॅल महेडु उल्लायन्स

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Tuesday, 8 August 2017

સકળ વિશ્વની મોગલ શક્તિ

સકળ વિશ્વની મોગલ શક્તિ

મોગલછોરૂ નો પોકાર અડધા સાદે સાંભળી ને #ભીમરાણા થી પહોંચે
પણ પોકાર નાભિ ને અંતર થી નાદ થાય તો,
કવિ મોતીસીંગ મહેડું  આઇ મોગલ વિશે કહે છે કે
કરતા હરતા કાયમ મોગલ, વીણ મોગલ એં જૂઠી વાત
જ્ઞાન યોગ મોગલ પદ ગણીએ,નવરસ મોગલ બીમનીહાળ
સાન મોગલની દિયે સ્તુતિયું,જ્યોતિષ મોગલ તણો જવાબ
ત્રિભુવન મોગલ તણો તમાશો,આંખે જગ મોગલ એ રાબ
આદ રૂપ મોગલ એ ઉમિયા,તેત્રીસ કોટી મોગલ ના તન
નવલાખરૂપે મોગલ નિક્ષય,માને માનવ સાચે મન
#એમોગલ #ઓખાધર #જન્મ્યાં #દેવસુર #ઘાંઘણીયા #દ્વાર

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खरो परचो खोडली चारण कवि श्री कानदास महेडु

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      खरो परचो खोडली

चारण कवि श्री कानदास महेडु

तेमणे भूज नी व्रज भाषा नी पाठशाळा मां अभ्यास कर्यो हतो

कवि नु जन्म इ स 1757
मृत्यु इ स 1859

टाइप हरि गढवी
गाम ववार
ता मुंन्द्रा    कच्छ
मो  96380 41145

                    दुहो

पसा उक्त दे गणपति सधबध नाअक साम
आद शक्त गण उचारुं प्रथम करुं प्रणाम

मामडिया मादा तणी चडतुं रखण चकार
मेखासुर हणवा मैया तें सज कीधो शणगार

                     छंद

ते शणगार धवा, किउ सजवा, दूत भजवा डारंणं
डहकिया छाकं, रुंड डाकं, विरहाकं वारणां
फेट मां अरचो, करण परचो, मीयण चोपड धलमली
शरमोड शरचो, अळां अरचो, खरो परचो खोडली

तण वखत झोळा, मळे टोळा, नवेलख सोळा नुधि
मळे रुद्राणी, ब्रह्माणी, व्रशनाणी थे वृद्धि
कोयलावाळी, महाकाळी, खपराळी तां खळी
      सरमोड सरचो,,,,,,

भडइउ साखर, भणंक भाखर, खमंड पाखर खेतलो
धूमती ढेली, रमत धेली, बांआं बेली ब्रझलु
आदि अनादि, जोरे जादी, चंडीका मादी चली
       सरमोड सरचो,,,,,,,,

धुधरुं धमके, चूड चमके, चलत ठमंके, चंडिका
हींडळे सारे, कंठहारं, मुक्तसारं मंडिका
झालरुं झळके, वेण वळके, बेहद भळके बंदली
       सरमोड सरचो,,,,,,

रमझोळ रममं, ठोर ठमंमं, धोर धममं, गाजिअं
सोहे सकोमळ, अंग उजळ, रेख काजळ व्राजीअं
भाल सिदूरं, भरपूरं अरक, नूर ओडली
            सरमोड सरचा,,,,,,

वधपना वळळ जोतझळळळ, भजे भळळळ भेळियो
सुधा समोहं अंग सोहम् बोह डोहंब कियो
झुलरां खोडी, रम जोडी, छप्पन कोडी सरछली
          सरमोड सरचो,,,,,,,,

त्रसूळ त्रछट, अरि अछट, प्रथी पटे पाडे दिउ
दोह वाट अडडड, रगत दडडड, मरड मेखो मारिउ
भर पत्र कुंडां, थइ भ्रेकूडां, रुड मुंडा रोडली
            सरमोड सरचो,,,,,,

जेकार थाहर, जगत जाहर, सदा वाहर सेवगां
उपटे धावे, मैआ आवे, लज रहावे देलगां
वधार वानड, अख आनंड, भणे कानड भणी
शरमोड शरचो, अळां अरचो, खरो परचो खोडली

                  छप्पय

खरी देव खोडल, वदे जस जगत वचाळे
खरी देव खोडल, भोवण परचो जग भाळे
खरी देव खोडल, नीयणां दलद्र निवारण
खरी देव खोडल, मतंग मेखासुर मारण
चारण वरण राखत चडा, अळ मादाकुळ अवतरी
करजोड कान महेडु कहे, खोडल देवी हे खरी जीय खोडद देवी हे खरी

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