Tuesday, 28 February 2017

चाळराय चाळकनेची रो डिंगळ गीत - कवि केसरदानजी खिडिया*

  
चाळराय चाळकनेची रो डिंगळ गीत – कवि केसरदानजी खिडिया

     *॥गीत – प्रहास साणोर॥*

चरै  मां  संदशा  करै डसण विधि   चोगणी,
      खसण विध नोगणी धरै खूनां।
सोगणी   खितारै  धाक  चढि  आसुरां,
     
    जोगणी चितारै वयण जूनां॥1॥

आज   म्है  आविया  माढ  पग   अबरखे,
      डबर कै छांडि पग मती डागो।
दीसहत   खबर  कै  घणो  जग   देखसी,
      बीसहथ जबर कै देखि बागौ॥2॥

कवळ   कतळावियो  जेम  खाटक   करै,
      जिको अतळावियो केम जावै।
मात   बतळावियो   बोलियो   मातसूं,
    मेछ पतळावियो कठे मावै॥3॥

मात   हिंगळाज   सूं  अकर  चढ  मकरियो,
      चकरि चढ हकरियो रुधिर चगतो।
बिकट   चसमांण   जमदूत   गत   बकरियो,
    डकरियो गजब असमाण डिगतो॥4॥

हाँक   नवलाख   री  हेक  जिम  हुचकै,
     थिरत भव लाखरो हेक थायो।
आप   सब   लाखरो  रुप कर  आहुडै,
     इतै नवलाख रो रुप आयो॥5॥

मेछ  डंड  कड़ड़  नासा ठड़ड़  हड़ड़ मुख,
      ब्रह्म पुड धड़ड़ गज गड़ड़ बागो।
धूत  पत  तनिक  जिम जड़ड़ खंच शूळ धर,
     भूतपत धनक जिम बड़ड़ भागो॥6॥

पाट   तौ   तणां  विरद  किसूं केहर पुणै,
      थाट पत तणां ब्रद सथर थाया।
चाळकै    दैतनूं     मारियो    चंडिका,
    रुप थाहरा नमो चाळराया॥7॥

    *कवि केसरदानजी खिडिया*
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आरती जय मां चालराय

                            आरती
                   *जय मां चालराय*

कुळदेवी मंगळ याद करुं छुं याद करुं त्यां आवजे.
विपदा विडारण धर्म धारण जरा वार न लावजे.
देवी दयाळी मेहर करजे भांगे दुःख तुं भासती .
कुळदेवी मंगळ मात चालराय आजे उतारुं  आरती.... 1
समर जीत देवणी देवी दैत्य तुं संहारती .
धरा तणो पाप वध्यो तुं ही क्षिण उबारती.
धर रुप अनेक देवी तुं तो अळग नामे ओळखावती.
कुळदेवी मंगल मात चालराय आजे उतारुं आरती.......2
लाल आँख्युं हाथे शस्त्र तुं चामुंडा कहावती.
देवी कृपाळी जोर भुजाळी तुं रवराय पुजावती.
मनमूरत सोवन गळे माळा दैत्य मुंडन सुहावती.
कुळदेवी मंगळ मात चालराय आजे उतारुं आरती...3
धर रुप विकराळ देवी तुं तो निज सेवगां संकट उबारजे.
कर जोड़ करे अरदास"दास" भवपार माड़ी उतारजे.
आवजे सेवगां साद तणी वार न लाजे महामति.
कुळदेवी मंगळ मात चालराय आजे उतारुं आरती.....4



प्रिंस देवल "दास" भलूरी बीकानेर
सादर जय माताजी
त्रुटि हेतु क्षमा
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Saturday, 25 February 2017

पाक में एक परिवार मेहड़ू भाइयो का एक परिवार

.           पाक में मेहड़ू भाईओ का एक परीवार

जय माताजी,              जय चालाक नेची माँ*

*अभी हमारे मेहड़ू भाई पाक (राठी)  में रह रहे उनकी थोड़ी बहोत जानकारी प्राप्त हुई है,*


.                        *स्व. मालदानजी*
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                         *स्व. रुघदानजी*
                                  ⬇
                          *स्व.पूजदानजी*
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      *1. पीरदानजी            2. प्रतापदानजी*
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                         *1. पीरदानजी*
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*1.चनणदान2.मुकेशदान3.समर्थदान4.आंसूदान*
.       *चारो भाइयो का विवाह हो गया है।*
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                         *2. प्रतापदानजी*
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*1.रूपदान, 2. लाधूदान, 3.     4.*

*प्रतापदानजी के भी चार लड़के है दो के नाम की जानकारी मिली है।*
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Friday, 24 February 2017

मेहड़ू

.                          मेहड़ू जाती
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.                      *मेहड़ू(तैनाथी मेहड़ू शाखा चाली)*
                               ⬇
                            *राणो*
                               ⬇
                           *फरशु*
                               ⬇
                            *राम*
                               ⬇
                          *भुवन*
                               ⬇
                          *काशप*
                               ⬇
                     *बळराम (बाणो)*
                               ⬇
                           *रतन*
                               ⬇
''"|'''''''''''''''''''''''|''''''''''''''''''''''''''|''  
 *कुल*          *बोवीर*            *लुणपाल*


*नोध:-*  ढोला मारुना सौ प्रथम चारणी शैलीमां डिंगल दुहा लखनार लुणपाल मेहड़ू  (देगाम) ने आ कृति माटे जूनागढ़ राज्य तरफथी  ५० करोड़नो क्रोड पसाव थयो हतो।

देगाममां बीजा लुंणपाल मेहडुने पण थळा राज्य धांगध्रा तरफथी जागीर मळी हती अने साथो साथ राजा भीमसिंहे पोतानु देहदान-अंगदान करेल हतुं.
लुणपाळ मेहड़ू (पहेला) ने बार बिरदो मल्या हता आ मेहड़ू कुळमां थरपारकरमां धनराज मेहड़ू प्रतापी अने उदार पुरुष हता तेमने बिरदावतो आ दोहो जुओ.

*विशोतर अंजस करे, अंजसे मेहड़ू आज।*
*काळीझर अंजस करे, राज थकी धनराज।।*


आ मेहड़ू शाखने गौरव अपावे तेवा उत्तरोत्तर कर्मी पुरुष आ शाखामा थया अने हाले पण स्यामलदान शंकरदानजी मेहड़ू सुहागी राजस्थान जेवा सुप्रसिद्ध कवि रत्नों आ शाखामां मोजुद छे.
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Thursday, 23 February 2017

जाडा मेहड़ू विसे सम्पूर्ण जानकारी

.       *जाडा मेहड़ू विसे सम्पूर्ण जानकारी*
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महेडवा गाव में आकर चापाजी महेडु ने बाड़ी पाई और चापाजी के स्यामदासजी पुत्र हुए और स्यामदासजी के धर्मदासजी, धीरजी, चंद्रावतजी, किसनसिंह और मेहकरणजी पाँच  पुत्र हुए, मेहकरणजी बड़े विद्धवान थे।
कविवर चारणों के महेडु शाखा का राज्यमान्य कवि था। उसका वास्तविक नाम आसकरण था। राजस्थान के कतिपय साहित्य वेताओं ने अपने ग्रंथों में उसका नाम मेंहकरण भी माना है। किंतु उसके वशंधरो ने तथा नवीन अन्वेषरण-अनुसंधान के अनुसार आसकरण नाम ही अधिक सही जान पड़ता है।
वह शरीर से भारी भरकम था। स्थूलकायता के कारण उसका जाडा नाम भी प्रचलित हुआ।
बादसाह अकबर ने जगमाल सिसोदिया सिरोही को सिरोही के राव सुरताण देवड़ा के विरुद्ध भेजा था। जाड्डाजी उस युद्ध में वीरता से  श्री जगमाल का सहयोग देते हुए वि.स. 1640 कार्तिक शुक्ला 11 को युद्ध में काम आ गये।
जाडाजी के चार भाई और थे। इनके वंसज बाड़ी में भी है, और राजोलाखुर्द, झुठा, जोधावास, बोरूदा में भी है।
जाडाजी के पुत्र कल्याणदासजी के पुत्र कर्मचन्दजी को वि.स. १६९७ में आसोज सुदी १० मुकाम अजमेर में राजा श्री रायसिंह राज टोडारायसिंह से जेथल्या गांव छः  घोडा की जागीर मिली। कर्मचन्दजी को गांव भाणपूरा बूंदी नरेश से जागीर में मिला था। इसी वंस में महेडु प्रभुदानजी जाडावत का जन्म हुआ। जो एक बहुत बड़े दानी हुए।
इसी वंश में महेडु कृपारामजी जाड़ावत हुये। शाहपूरा के राजा श्री उम्मेदसिंह ने अपने लघु पुत्र जालिमसिंह को युवराज बनाने के कारण अपने बड़े राजकुमार अदीतसिंह और पौत्र रणसिंह को मारने के लिए कामलिया नामक यवन को भेजा।  कालमिया ने ज्यो ही रणसिंह पर खङग प्रहार करना चाहा, परन्तु उसी समय रणसिंह के पुत्र भीमसिंह के हाथों से वह यवन मारा गया। राजा श्री उम्मेदसिंह का विचार पौत्र प्रपौत्रादि को मारकर जालमसिंह को युवराज बनाने का था। उसी समय महेडु कृपारामजी जाडावत ने जाकर राज सभा में यह दोहा सुनाया-

*​मिण चुण मोटाड़ाह, तै आगे खाभा बहुत।​*
*​चेलक चीतोड़ाह, अब तो छोड़ उम्मेद सी​*

इस दोहे से राजा का ह्रदय परिवर्तन हो गया और शाहपुर का राज कुटुंब मृत्य के मुख में जाने से बच गया।  देवलिया प्रतापगढ़ के शासक महारावत श्री उदेसिंह ने महेडु गुलाबसिंहजी जाडावत की बुद्धिमानी से प्रसन होकर पैर में स्वर्ण आभूषण व सचेई नामक गांव जागीर में दी। इनके सम्बध में यह दोहा प्रसिद्ध है-

*​सुला गोला सोहिता, दारु मांस पुलाब।​*
*​जिमावे जाडाहरो, गायड़ मल्ल गुलाब।।१​*

जाडा महेडु के वंशजो में स्वनाम धन्य महादान नामक वीर एवं श्रगाररस के सिद्धहस्त कवि हुए है। कुलदेवी चालकनेच की रोमकद जाती के छंद में की गई उनकी स्तुति तो बालको के रोग निवारण हेतु मन्त्र स्वरूप मानी गई है। उस स्तुति के प्रारंभ के दोहे इस प्रकार है-

*​चाळराय रै चाळरी, झाली सेवक झब।​*
*​वळीयो दिन टळीयो विघन, आगण फळीयो अब।।​*
*​दे झंझेड़ी रोग दुख, पग बेड़ी खळ पेच।​*
*​तू  बालक तेड़ी तठे, नेड़ी चाळकनेच​*

जोधपुर के विधाप्रेमी महाराजा मानसिंह ने महादान महेडु की प्रतिभा का सम्मान करते हुए उन्हें अपनी पसंद का गांव मांगने की छूट दे दी तब महादान महेडु ने अपना मंतव्य इस दोहे के माध्यम से प्रकट किया-

*​पांच कोस 'पचोटियो', आठ कोस 'आलास'।​*
*​नानेरा म्हारा नकै, समपौ 'सोढावास'।।​*

इसी वंश में आगे ग्राम जेथलिया में श्री साहिबदानजी हुए। रावराजा श्री फतेहसिंहजी उणीयारा ने उनका स विधि सम्मान किया और उनकी प्रशंसा में यह दोहा कहा-

*​साहिबा थारा अंक सह, घड़िया बेह घड़ाव।​*
*​जाणक कंचन में जिके, जड़िया रतन जड़ाव।।​*

श्री गोपसिंहजी जाडावत के ऊपर दुश्मनो ने अचानक हमला बोल दिया।
हमला बोलने वाले दुश्मनो को गोपसिंहजी ने युद्ध में ललकारा और थोड़ी सी देर में ही सभी दुश्मनो को रण खेत में सुला दिया। इनकी बहादुरी देखकर कविवर पृथ्वीसिंहजी महियारिया राजपुरा ने यह दोहे कहे-

*​समत इक्यासी जेठ सूद, बारस अरु रविवार।​*
*​जाडा हर किन्ही जब्बर, बाही खाग बकार।। १​*
*​आडा शत्रु आविया, कर गाढ़ा हद कोप।​*
*​जाडा हर किन्ही जब्बर, गाढ़ा दिल से गोप।। २​*
*​जाडा महेडु जंग में, रण गाढा पग रोप।​*
*​खाळ बहाया खून रा, घणा रंग तोय गोप।।३​*

वर्तमान समय में मऊ ठाकुर साहब श्री पीरदानजी जाडावत ने वि. स. १९९६ के भीषण दूर्भीक्ष के समय अपने एक हजार याचको के लिए बारह महीनों तक भोजन व्यवस्था की । इनके बारे में यह दोहे प्रशिद्ध है-

*​तरवर गंगा तीर, ताकव घुणी तापियो।​*
*​ते पायो तकदीर, पीर महड़वा पाटवी।। १​*
*​पीरा कहवे पात, इल ऊपर रहिज्यो अमर।​*
*​मग जण रो मां बाप, कलजुग में दूजो करण।।२​*

इसी वंस में शकरदानजी का जन्म वि. स. १९८६ मिती भादवा ७ को हुआ।
इनके पिता श्री भेरूदानजी थे।
पिता श्री का स्वर्गवास १९९८ में मिति आसोज सुदी ८ को हो गया। उस समय इनकी उम्र १२ वर्ष की थी।

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जाडा का पूर्वज मेलग मेहडु था। मैंलग मेवाड़ राज्य के बाड़ी ग्राम का निवासी था। मेलग के वंश में लूणपाल ख्यातिलब्ध व्यक्ति हुआ। 

जाड़ा मेंहडु जगमाल का आश्चित तथा कृपापात्र था।

जाडा मेंहडु की रचनाओं तथा ख्यातो में प्राप्त अन्य प्रसंगों से भी यह पाया जाता है कि जाडा मेहडु दत्ताणी के चर्चित युद्ध (वि. स्. १६४०) के बाद तक भी जीवित था। उपर्युक्त युद्ध घटना के पश्चात् नवाब खानखाना, रहीम राव केशवदास, भीमोत राठौड़, मानसिंह बागडिया चौहान तथा शार्दूल पवार आदि पर रचित कवि का उपलब्ध काव्य भी हमारे कथन की पुष्टि करता है। शार्दूल पवार और भोपत राठौड़ आदि के मध्य मार्गशीर्ष शुक्ला १५ स्. १६६३ वि. में युद्ध हुआ था। जिसका जाडा ने सविस्तार वर्णन किया है।

महाराज रायसिंह के जैसलमेर में विवाह और उस अवसर पर दान देने का गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा डॉ. सी. कुन्हनराजा तथा तत्सामयिक कवि गोपा सिढायच चारण के गीत इत्यादि से भी प्रमाणित है। अतः इन उल्लेखों के साक्ष्य से यह स्पष्ट होता है कि रायसिंह जैसे दातार का जहां विवाह होगा, वहां कवि नहीं आये होंगे और उन्हें दान न दिया होगा, यह कैसे माना जा सकता है। इसलिए यह सिद्ध होता है कि कवि जाडा मेहड़ू सं. १६४९ में जीवित था और उसने बीकानेर नरेश से एक हाथी पाया था।

जाडा के तीन पुत्र और एक पुत्री थे। जिनके कल्याणदास, रूपसी, मोहनदास तथा कीका (कीकावती) नाम थे। 

कीकावती का विवाह ख्यातिलब्ध बारहठ लक्खा नांदणोत के साथ हुआ था। प्रसिद्ध महाकाव्य 'अवतार चरित्र' का प्रणोता, महाराणा राजसिंह मेवाड़ का काव्य गुरु तथा महाराजा मानसिंह जोधपुर का श्रद्धाभाजन नरहसिंहदास बारहठ और उसका अनुज गिरधरदास जाडा के दोहिते थे। 

जाडा के पूर्व निर्देशित तीनों पुत्रों में जेष्ठ कल्याणदास अपने समवर्ती चारण कवियों में अति सम्मानित, राज्यसभा-समितियों में प्रतिष्ठत तथा श्रेण्य कवि था। कल्याणदास को जोधपुर के महाराजा गजसिंह राठौड़ ने १६२३ तथा १६६४ वि. में क्रमश: एक लाख पसाव व एक हाथी तथा एक लाख पसाव प्रदान किया था। अब तक की अनुसंधान-अन्वेषण में कल्याणदास के राजस्थान के शासकों तथा योद्धाओं पर सर्जित कोई १२ वीरगीत ८ छप्पय और बूंदी राज्य के परम प्रतापी शासक राव रतन हाडा के युद्धों पर रचित 'राव रतन हाडा री वेली' खण्ड काव्य प्राप्त है। राव रतन हाडा री वेली जहां कोटा-बूंदी के हाडा शासकों के इतिहास के लिए महत्व की कृति है। वहां राजस्थानी वीर काव्य परंपरा की भी पाक्तीय रचना है। राजस्थानी के वेलिया गीत छंद में रचित यह डिंगल की उत्कृष्ट रचना है। रूपसी और मोहनदास का कविरूप में कहीं कोई परिचय अधावधि अनुपलब्ध है। मोहनदास के पुत्र बल्लू मेंहडु के गीत, कवित्त, दोहे आदि स्फुट छंद गुटको में यंत्रतंत्र मिलते हैं। वह बूंदी के रावराजा शत्रुशाल, महाराजा अजीतसिंह जोधपुर महाराजा सवाई जयसिंह कछवाहा आदि का समकालीन था। रावराजा शत्रुशाल ने उसे बूंदी का ठीकरिया गांव प्रदान किया था।

कवि का काव्य सर्जनकाल वि. स्. १६२४ - १६७२ वि. तक स्थिर किया जा सकता है। तदनुपरात कवि रचित काव्य उपलब्ध नहीं हुआ है। इससे प्राप्त आधारों पर यह अनुमान किया जा सकता है कि स्. १६७१ - ७२ वि.  के पश्चात ही कवि का किसी समय निधन हो गया होगा?
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